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Monday, January 18, 2021

दशहरे के मौके पर जानते हैं रावण के दशानन बनने की कहानी

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पूरे देश भर में दशहरे का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है । मालूम हो कि दशहरा का त्योहार असत्य पर सत्य, और बुराई पर अच्छाई के प्रतीक के रूप में मनाते हैं । दशहरे के दिन पूरे देश भर में रावण के पुतले का दहन का आयोजन किया जाता है । दशहरे पे रावण के साथ-साथ कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले भी जलाया जाता हैं । लंका के राजा रावण को बुराई के प्रतीक के रूप में माना जाता है और ऐसा कहा जाता है कि रावण के दस सिर थे । इसलिए उसे दशानन कहा जाता था ।

मालूम हो कि दशानन का अर्थ होता है दस सिरो वाला । ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने वर्षों तक तपस्या की थी इसके बाद भी भगवान शिव रावण से प्रसन्न नहीं हुए थे । तब रावण ने भगवान शिव को अपना सिर अर्पित करने का निर्णय लिया था । दरअसल रावण भगवान शिव का सबसे बड़ा भक्त था । रावण भगवान शिव की शक्ति में लीन होकर अपना सर काट कर शिव जी को अर्पित कर दिया । लेकिन उसके बाद भी उसकी मृत्यु नहीं हुई और ऐसा कहा जाता है कि उसकी जगह पर दूसरा सिर आ गया और ऐसे करते-करते रावण ने एक-एक करके 9 बार अपना सिर भगवान शिव को अर्पित किया । लेकिन जब रावण ने दसवीं बाद भगवान शिव को अपना अर्पित करने जा रहा था तो भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हो गए और उसे वरदान दिए ।

मोह, गौरव,  ईर्ष्या, ज्ञान, चित्त और अहंकार ।  वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि रावण के सिर पर दस सर नहीं था, बल्कि वह लोगों में दस सर होने का भ्रम पैदा करता था और इसी वजह से उसे दशानन कहा जाता है । जैन शास्त्रों में भी रावण के बारे में जानकारियां मिलती हैं । जैन शास्त्रों में बताया गया है कि उनके गले में 9  मणियों की माला थी और उन मणियों में रावण का सिर देखता था और इससे दूसरे लोगों को या भ्रम हो जाता था कि रावण को दस सर है । इसके अलावा ऐसा कहा जाता है कि रावण बहुत विद्वान था उसने छह दर्शन और चार वेद  कंठस्थ थे और इस वजह से उसका नाम दस कंठी हो गया था जिसे लोग दस सिर मान लिए ।

रामचरितमानस में भी रावण के बारे में आता है । रामचरितमानस में बताया गया है कि भगवान राम से युद्ध के लिए आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन रावण निकला था । हर दिन उसका एक सिर कट जाता था और दसवें दिन यानी कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी के दिन उसका वध हुआ था । इसी मान्यता के चलते दशमी के दिन रावण दहन किया जाता है और बुराई पर अच्छाई के तौर पर दशहरा पर्व मनाया जाता है ।

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