दल बदल कानून और उसी से जुड़ी सभी बातें
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दल बदल कानून और उसी से जुड़ी सभी बातें

इन दिनों राजस्थान में सियासी घमासान मचा हुआ है। एक तरफ राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थक वाले विधायक घंटों धरना दे रहे हैं तो दूसरी तरफ राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र ने कहा कि वह बहुमत परीक्षण के लिए एक विशेष विधानसभा सत्र बुलाएंगे।

बता दें कि कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पद से हटाने की बात कर रहे हैं और कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट को बागी विधायक भी करार दिया जा रहा है।

सचिन पायलट के समर्थन में भी कुछ विधायक हैं जो विधानसभा में अनुपस्थित रहने और बिल का विरोध करने जैसे फैसले कर सकते हैं। बता दे कि इसके पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्यप्रदेश में कांग्रेस पार्टी को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था।

उसके बाद अब भाजपा के विधायक सचिन पायलट को भी भाजपा में शामिल होने का आमंत्रण दे रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या इतना आसान होता है कि एक नेता दूसरी पार्टी में शामिल हो जाये? इसके लिए भारत में दल बदल विरोधी कानून बनाया गया है।

इसकी आवश्यकता विशेष रूप से 1967 के बाद महसूस हुई थी क्योंकि उसके पहले तक देश में दल बदल के लगभग 50 मामले आए थे और ये मामले ज्यादातर राज्य स्तर पर थे और इनमें अधिकतर मामलों की वजह राजनीतिक विचारधारा ही थी।

देश के चौथे आम चुनाव में दलबदल ने अभूतपूर्व भूमिका निभाई क्योंकि ज्यादातर विधायक और सांसद अपने राजनीतिक भविष्य के चलते अपने पुराने दल को छोड़कर दूसरे दल में शामिल होने लगे थे और यह भी देखने को मिला कि अगर पार्टी द्वारा विधायकों से किये गए वादे पूरे नहीं किए जाते थे तो विधायक पार्टी बदल लेते थे।

1967 से 1972 के दौरान करीब 50 से अधिक विधायकों ने ऐसा किया था। सबसे बड़ा उदाहरण हरियाणा में मिला। यहां के एक विधायक गया लाल ने 1967 में 1 दिन में 9 घंटे के अंदर कांग्रेस में शामिल होने के लिए संयुक्त मोर्चा नाम की पार्टी छोड़ दिया था और फिर 9 घण्टे के अंदर ही कांग्रेस से इस्तीफा देकर संयुक्त मोर्चा में वापस शामिल हो गए थे।

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तब 1985 में नेताओं द्वारा की जाने वाली इन गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए संविधान की ‘दसवीं अनुसूची’ में कुछ उपबंध किए गए और एक विधायक या सांसद को दल बदल के लिए अयोग्य ठहराने के लिए कानून लाया गया।

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अगर कोई सांसद या विधायक किसी पार्टी की सदस्यता छोड़ कर पार्टी के निर्देशों का पालन नहीं करता तब उसे दलबदल माना जाता है। लेकिन भारत के दल बदल कानून में राजनीतिक दलों की संरचना को सही ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है और स्पीकर द्वारा किए गए निर्णय को अदालत के कार्य क्षेत्र से बाहर रखा गया है तो भी इसके बावजूद कई बार मामले अदालत तक पहुंच जाते हैं।

मौजूदा समय में राजस्थान का संकट सदन के बाहर विधायकों की भूमिका और उनकी अभिव्यक्ति की आजादी का मामला है।

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भारत में दल बदल कानून 1985 में 52 वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया है जिसमें दलबदल क्या है और दलबदल करने वाले सदस्यों को अयोग्य ठहराने के प्रावधानों को परिभाषित किया गया है।

ऐसा इसलिए किया गया है ताकि राजनैतिक लाभ के उद्देश और पद के लालच के बदले दलबदल करने वाले जनप्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराया जा सके और सांसद में स्थिरता बनी रहे। किसी भी विधायक या सांसद को अयोग्य तब घोषित किया जाता है –

  • जब वह निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है
  • कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है
  • किसी सदस्य के द्वारा सदन में अपनी ही पार्टी के पक्ष के विपरीत वोट कर देता है
  • कोई सदस्य स्वयं को वोटिंग प्रक्रिया से अलग रखता है आदि।

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