अगले 10 सालों में Artificial Sun से रोशन होगी दुनिया आइए जानते हैं इस तकनीक के बारे में

अगले 10 सालों में Artificial Sun से रोशन होगी दुनिया आइए जानते हैं इस तकनीक के बारे में

अगले 10 सालों में Artificial Sun से रोशन होगी दुनिया आइए जानते हैं इस तकनीक के बारे में

अगर सब कुछ ठीक रहा और काम सही ढंग से चलता रहा तो अगले 10 सालों में धरती Artificial Sun की रोशनी पा सकेगी।

मैसाच्युसेट्स यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी और कामनवेल्थ फ्यूजन सिस्टम कंपनी मिलकर इस संबंध में काफी समय से काम कर रही हैं।

अब उन्हें उम्मीद की एक करण दिख रही है। ऊर्जा उत्पादन से उत्पन्न होने वाले खतरे को दूर करने के लिए दोनों विश्वविद्यालय फ्यूजन और फीजन का प्रयोग किया है।

अब वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे कृत्रिम रोशनी तो मिलेगी साथ ही है यह पर्यावरण के लिहाज से भी बेहद सुरक्षित होगा।

ऊर्जा का स्त्रोत :-

बता दें कि फ्यूजन ब्रह्मांड में ऊर्जा का स्त्रोत माना जाता है, सूर्य समेत जितने भी तारे हैं वह सब फ्यूजन के माध्यम से ही ऊर्जा उत्पन्न करते हैं।

जब हल्के अविश्वासनीय ने दबाव और तापमान की वजह से ये आपस में मिलते हैं तब इस प्रक्रिया में एक ऊर्जा निर्माण होता है। इस प्रक्रिया को ही फ्यूजन कहा जाता है।

इसके तहत बहुत सारी ऊर्जा उत्सर्जित होती है। अगर कार्बन और ऑक्सीजन मिलकर कार्बन डाइऑक्साइड बनाते हैं तो यह कार्बन स्वर्ण भी बन सकता है।

सितारों में समानता हल्का का हाइड्रोजन होता है और फ्यूजन होने से हीलियम का कारण बनता है। यही सेम प्रक्रिया धरती पर किसी परमाणु रिएक्टर में होती है। यह ठीक उसी तरह से है जैसे सूर्य को किसी डिब्बे के अंदर बंद कर दिया जाए।

मैसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों का कहना है कि वह इस अवधारणा पर काम कर रहे हैं कि इसव डिब्बे में बंद सूरज नाम दिया जाए, जो कि मूल रूप से घर प्रकाश का एक स्त्रोत होने वाला है। यह एक ऐसा बॉक्स होगा जो सभी गर्मी को इकट्ठा करने का काम करेगा।

फ्यूजन से मिलने वाली ऊर्जा फायदेमंद लेकिन रेडियोएक्टिव तत्व खतरनाक :-

परमाणु ऊर्जा एक नया विषय अब नहीं रह गया है भारत लगभग 55 साल से इस संबंध में कार्य कर रहा है विश्व में करीब 440 परमाणु संयंत्र है और यह सभी फ्यूजन यानी कि परमाणु विखंडन के जरिए ऊर्जा पैदा करते हैं।

जिससे रेडियोएक्टिव पदार्थ भी निकलता है और यह रेडियोएक्टिव कचरा मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक होता है। इससे परमाणु संयंत्र में दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं, जिसका काफी नुकसान भुगतना होता है।

लेकिन यदि परमाणु संयंत्र से ऊर्जा प्राप्त की जाती है तो इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि यह कार्बन फुटप्रिंट बहुत कम अथवा न के बराबर कर देता है और इससे पर्यावरण को बिल्कुल भी नुकसान नहीं होता है।

इस तरह रेडियोएक्टिव पदार्थ से मुक्ति :-

फ्यूजन के संबंध में लोग काफी समय से काम कर रहे थे क्योंकि फ्यूजन के तहत निकलने वाली रेडियो एक्टिव पदार्थ से वैज्ञानिक मुक्त पाना चाहते थे क्योंकि इससे ऊर्जा तो उत्पन्न होती थी लेकिन रेडियोएक्टिव कचरा भी उत्पन्न होता था।

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लगभग एक सदी से कोशिश ही हो रही थी कि कैसे रेडियोएक्टिव पदार्थों से मुक्ति पाई जाए। अब हाल के ही दिनों में मैसाच्युसेट्स सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी और कॉमनवेल्थ संयोजन सिस्टम कंपनी मिलकर इस दिशा में काम कर रहे थे, उसमें एक उम्मीद की किरण नजर आ रही है।

आने वाले समय में इससे परमाणु संयंत्र के अलावा हवा, सौर ऊर्जा संयंत्र से भी कार्बन फुटप्रिंट की समाप्ति हो जाएगी और इससे ऊर्जा विकसित होगी और यह ज्यादा उपयोगी हो सकेगी।

परेशानी :-

सबसे बड़ी समस्या यह है कि सूर्य को डिब्बे में बंद करने की प्रक्रिया कैसे की जाएगी क्योंकि यह सबसे बड़ी बाधा है कि इस ऊर्जा को कैसे संग्रहित किया जाए और उसका सही फायदा उठाया जाए।