आरक्षण की वर्तमान स्थिति

आरक्षण की वर्तमान स्थिति

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जी यदि आज जीवित होते तो अपना 130 वां जन्मदिन मना रहे होते। मैं सोचता हूँ यदि वह आज जीवित होते तो भारत की वर्तमान स्थिति पर क्या कहते। आरक्षण पर उनके विचार अब क्या होते।

निश्चित ही वह इसकी समीक्षा करने को कहते। आजादी मिलने के बाद के शुरुआती 10 वर्षों के लिए लागू किये गए आरक्षण को कुर्सी की चाह रखने वाले नेताओं ने वोट पाने की मशीन में तब्दील कर दिया। क्या अम्बेडकर जी अब भी इसे इसी तरह लागू रहने देते?

आजादी के बाद से सरकार कोई भी,कितनी भी ताकतवर रही हो किंतु आरक्षण हटाने/समीक्षा करने का साहस नही कर पाई।सभी जानते हैं कि आरक्षण देश को खोखला कर रहा है।
सबसे अच्छी प्रतिभायें बाहर ही नही आ पा रहीं।उनकी जगह कास्ट सर्टिफिकेट हाथ मे लिए वह लोग चुने जा रहे जो उक्त पदों के लायक ही नहीं हैं। टॉप रैंक लाने वाला परचून की दुकान चला रहा जबकि करीब करीब फिसड्डी लेकिन जाति प्रमाण पत्र मजबूती से थामे व्यक्ति सरकारी दफ्तर में ऊंचे ओहदे पर बैठा है।
समाज मे समानता लाने के उद्देश्य से लागू किया गया आरक्षण समाज में और गहरी खाई खोद रहा है।जातिप्रथा को और मजबूत कर रहा है।
बाबा साहेब यदि आज जीवित होते तो कई यक्ष प्रश्न मुंह बाए उनके सामने खड़े होते।
मसलन आरक्षण से अब तक हासिल क्या हुआ?क्या जातियां मिट गयीं?आजादी के 73 वर्षों के बाद भी क्या समाज मे समानता आ गई? क्या आरक्षण से दलितों/शोषितों/वंचितों को उनका हक मिल गया है?
हकीकत तो ये है कि हकीकत अब और तल्ख हो गयी है।  हाँ!आरक्षण से बाबा साहेब का दलित उन्मूलन का प्रयास सफल होता दिखता है।दलितों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है।कुछ अपवादों को छोड़ दें तो कह सकते हैं कि अब दलित दबे-कुचले नही रहे।
लेकिन बड़ा सवाल ये भी है कि यदि उनकी स्थिति सुधरी है तो आरक्षण की वैशाखी उन्हें कब तक मुहैया कराई जाती रहेगी।और इसका नुकसान सामान्य वर्ग कब तक उठाता रहेगा।क्या सामान्य वर्ग में गरीब/शोषित/दबे कुचले लोग नही हैं?
यदि हैं तो फिर उनके साथ भेदभाव क्यों? क्या वह सवर्ण होने का खामियाजा भुगत रहे हैं?समाज के दोनो पलड़ों को बराबर करने की कोशिश में यदि आज हम देखें तो जो पलड़ा पहले नीचे था वह तो ऊपर आ गया जबकि जिसे ऊपर माना जा रहा था, आरक्षण ने उसे नीचे ला दिया।पलड़े बराबर अब भी नही हो पाए।बस जगह बदल गयी।
सबसे बेहतर विकल्प तो यही होता कि आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू किया जाता ताकि इसका लाभ समाज के हर वर्ग को मिलता।तब स्थिति आज से भिन्न होती।दरअसल गलती अम्बेडकर जी की नही है उन्होंने वह किया जो उस  वक्त की जरूरत थी।
तब दलित वर्ग गरीबी और शोषण से जूझ रहा था।गलती बाद में आने वाले सत्तासीनों की है जिन्होंने कुर्सी लोलुपता में आरक्षण की समीक्षा नही की बल्कि बढ़ाते चले गए।यह आज भी जारी है और न मालूम कब तक जारी रहेगा।
आरक्षण की दूसरी कटु सच्चाई ये है कि जिनके लिए आरक्षण लागू किया गया उनमे से अभी भी बहुत से लोग इसका लाभ ही नही ले पाते बल्कि इसका लाभ वह लोग ले रहे जिन्हें इसकी जरूरत ही नहीं।
कुछ समय पहले की एक तस्वीर याद आती है।आरक्षण के समर्थकों ने भारत बंद का आह्वान किया था।भीड़ हिंसा पे उतारू थी।उन्ही लोगों में एक व्यक्ति था जो आरक्षण छीने जाने का विरोध कर रहा था जबकि आरक्षण लागू था ।
वह शायद विरोध इसलिए कर रहा था ताकि सरकार आरक्षण को टच करने की भी हिमाकत न कर सके।वह इसके लिए हिंसा पे भी उतारू था।उसके गले मे सोने की एक मोटी चेन(कम से कम 50 ग्राम की तो होगी), हाथ मे महंगा मोबाइल (सम्भवतः आई फोन) था।
मैं सोचता हूँ बाबा साहेब इस तस्वीर और इनके उपद्रव को देखते तब क्या कहते? एक व्यक्ति जो लाखों रूपये की वस्तुएं शौक के लिए शरीर मे धारण किये हो,वह आरक्षण बने रहने देने के लिए मरने मारने पर उतारू था।
क्या इस व्यक्ति को वाकई में आरक्षण की जरूरत है या वह आरक्षण इसलिए बने रहने देना चाहता है ताकि उसकी अय्याशियों में कमी न हो।बड़ी बात ये है कि आरक्षण का सर्वाधिक लाभ इन्ही के जैसे लोग ले रहे जिन्हें अब आरक्षण की कोई जरूरत नहीं।
भारतीय सत्तासीनों ने आरक्षण पर कभी ईमानदार सोच रखी ही नहीं।वरना जिस वर्ग के उत्थान के लिए इसे लागू किया गया था वह कब का ऊपर उठ चुका होता।किसी भी वर्ग को समाज मे संतुलन लाने हेतु ऊपर उठाने के लिए 73 वर्ष बहुत होते हैं।
देखते हैं भारतीय राजनेता/कर्णधार वोटबैंक की सोच से ऊपर उठकर कब भारत के हित में निर्णय लेते हैं।

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