क्या जानवर भी जीत और हार जैसी भावनाओं को महसूस करते हैं?

क्या जानवर भी जीत और हार जैसी भावनाओं को महसूस करते हैं?

क्या जानवर भी जीत और हार जैसी भावनाओं को महसूस करते हैं?

क्या आपने कभी सोचा है कि इंसानों की तरह ही क्या जानवर भी जीत और हार की भावना को महसूस करते हैं या नही? एक शोध के अनुसार जानवर भी इस तरह की भावनाओं को महसूस करते हैं।

ट्रेंस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के स्कूल आफ बायोलॉजिकल साइंस के शोधकर्ताओं ने एक नई थ्योरी बताई है। उन्होंने कहा है कि जैसे जीत और हार के मौके पर इंसानों के अंदर सकारात्मक और नकारात्मक भाव आते हैं ।

ठीक ऐसे ही भावनाएं पशुओं में भी देखने को मिलती है और उनके भीतर का यह अनुभव ही बाहरी और भविष्य के व्यवहार में बदलाव के रूप में सामने आता है। इस शोध के सार और निष्कर्ष को प्रोसीडिंग्स आफ द रॉयल सोसायटी बी जनरल में प्रकाशित भी कर दिया गया है।

जानवरों के बीच संसाधनों को हासिल करने के लिए की जाने वाली प्रतियोगिता के शुरुआती बिंद के तौर पर इसे लिया गया है जोकि वैज्ञानिकों को उनके मनोभावों की पड़ताल करने के लिए खींची गई है।

बता दें कि विकास, प्रजनन और टिके रहने की कोशिश में संसाधनों के इस्तेमाल के लिए जानवरो के बीच आपसी बातचीत ही प्रतियोगिता है और इस प्रतियोगिता में भावनाएं भी देखने को मिलती है और सबसे बड़ा तथ्य यह है कि सीमित संसाधन होने के कारण ही प्रतिस्पर्धा कराई जाती है।

ऐसे में कुछ संसाधन ऐसे होते हैं जो सभी के लिए आसानी से उपलब्ध होते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जिनकी आपूर्ति सभी के लिए संभव नही होती है। अब तक वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश करते रहे हैं कि पशु अपने संसाधन का इस्तेमाल किस तरह से करते हैं।

लेकिन नए साल शोध में यह तर्क दिया जा रहा है कि पशुओं के मूल्यांकन करने की कोशिश भावनाओं के चरण की तरफ ले जाती है और यही भावनाएं आगे चलकर उनके व्यवहार के रूप में परिवर्तित होती है।

शोधकर्ताओं ने बताया कि जैसे अवसाद या गुस्से से ग्रस्त इंसान भविष्य को लेकर निराशावादी दृष्टिकोण रखता है। उसी तरह जब कोई जानवर लड़ाई हार जाता है तब उसके अंतर नकारात्मक भाव आने लगते हैं।

जहां वह जीत सकते हैं वहां पर भी उनके अंदर निराशावादी भावनाएं देखने को मिलती है और हार की वजह से भविष्य में लड़ाई में हिस्सा लेने की उनकी इच्छा भी कम होती जाती है।

शोधकर्ताओं ने पाया है कि पशुओं के भावनाओ में भी ऐसे ही गैर संबंध वाले संज्ञान और व्यवहार से उनकी प्रभाविकता देखी गई है।

उदाहरण के लिए यदि कोई पशु प्रतियोगिता में जीत का अनुभव करता है तब वह और अधिक सकारात्मक भाव वाला होता है और इसी तरीके से यदि वह हारने का अनुभव करता है।

तब इसके अंदर नकारात्मकता का भाव होता है और भविष्य में इस तरह की लड़ाई दोबारा लड़ने से वह कतरा ने लगता है। जीवन और मौत से जुड़ी ऐसी कई घटनाएं खराब भावनाओं के लिए जिम्मेदार होते हैं। वह आपसी तौर पर निर्णय को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

यह शोध पशुओं की भावनाओं को स्वीकार करने की जरूरत पर जोर देता है, जिससे उनके व्यवहार को समझने में मदद मिल सकती है और पशुओं को कल्याण के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं पर बेहतर ढंग से काम किया जा सकता है ।

साथ ही यह भी समझने की कोशिश की जा सकती है कि कैसे नकारात्मक भावनाओं को सकारात्मक भावनाओं में बदलकर उन्हें जीने के लिए ढेर सारे अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

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