कुदरत की लालटेन कहे जाने वाले जुगनू, जलवायु परिवर्तन के चलते बुझने के कगार पर

कुदरत की लालटेन कहे जाने वाले जुगनू, जलवायु परिवर्तन के चलते बुझने के कगार पर

पहले गर्मियों के मौसम के बाद हल्की ठंड की शुरुआत में जुगनू हमें अक्सर शाम के मौसम में या फिर रात में दिखाई पड़ जाते थे। जुगनू दरअसल मौसम के बदलाव की तरफ भी इशारा करते हैं लेकिन आज जुगनू शायद ही देखने को मिलते हैं।

मसूरी के स्थानीय लोगों का कहना है कि उन लोगों ने लगभग दो दशक से जुगनू नही देखा है। दुनिया भर से जुगनू बहुत तेजी से खत्म हो रहे हैं।

दरअसल जुगनू एक विचित्र कीट होते हैं, इनके बारे में बताया जाता है कि इनके पेट में रोशनी पैदा करने वाला एक अंग होता है जो कि विशेष कोशिकाओं से जब ये ऑक्सीजन को ग्रहण करते हैं और फिर इसे लूसीफेरिन नाम के एक तत्व में बदल देता है जिसकी वजह से जुगनू से रोशनी उत्पन्न होती है।

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आंकड़े के मुताबिक दुनिया भर में मौजूद कीड़ों की प्रजाति में जुगनू की हिस्सेदारी लगभग 40% की है। अमेरिका के पेंसिल पेंसिलवेनिया स्थित बकनेल विश्वविद्यालय में इवोल्यूशनरी जेनेटिक्स सारा लोवर का कहना है कि जुगनू कोलियोप्टेरा परिवार से संबंध रखते हैं और यहां डायनासोर के युग से ही चले आ रहे हैं।

आज दुनिया भर में 2000 से भी अधिक जुगनू की प्रजातियां पाई जाती है। अगर अंटार्कटिक को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी महाद्वीप में जुगनू की मौजूदगी है। भारत में जुगनू को अलग-अलग हिस्सों मे अलग-अलग नाम से लोग जानते हैं।

इन्हें हिंदी भाषा में जुगनू तो बंगाली में जोनाकी पोका नाम से जाना जाता है। यह कीट रात में निकलते हैं और इनके पंख ही विशेष होते हैं और इनके यही पंख इन्हें अन्य परिवार के सदस्यों से अलग करते हैं, जो गुण इनके व्यवहार में एक पैटर्न पर होता है। हर चमक एक पैटर्न के साथ अपने साथी को तलाशने के लिए प्रकाश से संकेत करता है।

जुगनू के संबंध में कहा जाता है कि जब छिपकली जैसे जीव इन पर हमला करते हैं तब जुगनू रक्त की बूंद उत्पन्न करते हैं दरअसल यह रक्त की बूंदे के रूप में जहरीले रसायन होते हैं।

जुगनू पर्यावरण के स्वास्थ्य के संबंध में भी संकेत करते हैं। बदलते पर्यावरण के प्रति जुगनू बहुत ज्यादा संवेदनशील होते हैं और यह केवल स्वस्थ वातावरण में ही जिंदा रह पाते हैं।

ज्यादातर जुगनू वही पर रह पाते हैं जहां का पानी जहरीले रसायनों से मुक्त होता है। जुगनू प्रमुख रूप से पराग के सहारे ही जिंदा रह पाते हैं। कई सारे पौधों के परागण में जुगनू महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाते हैं।

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जुगनुओं की उपयोगिता के संबंध में वैज्ञानिक का कहना है कि उनके चमकने के गुण के कारण कैंसर जैसी बीमारियों का पता लगाने में यर मददगार होते हैं।

अब हर जगह घटती संख्या देखी जा रही है। हालांकि इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा तो नहीं है लेकिन कई सारी रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि इनकी संख्या सिकुड़ रही है और कई स्थानों से यह गायब हो चुकी है और ऐसे वातावरण में चले गए हैं जहां उनके अनुकूल परिस्थिति हैं, जैसे कि उनके हिसाब से पर्याप्त नमी और आद्रता वाले क्षेत्र।

पेड़ों की बढ़ती कटाई और शहरीकरण भी जुगनू के न होने का एक बड़ा कारण है। इसके अलावा प्रकाश के प्रदूषण की वजह से भी जुगनू एक दूसरे को न देख पाने की वजह से भी इनकी जैविक चक्र प्रभावित हो रहा है। कई सारी रिपोर्ट बताते हैं कि जुगुनू का प्राकृतिक आवास में काफी बदल रहा है इसका सबसे बड़ा कारण जलवायु संकट है।

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