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Monday, January 18, 2021

संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन से जुड़ी कुछ बातें और इसमे भारत का अहम योगदान

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संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन 24 अक्टूबर 1945 को किया गया था। इसकी स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व शांति के मकसद से किया गया था। कोरोना वायरस महामारी के चलते संयुक्त राष्ट्र की आम महासभा की 75 वर्ष का सत्र इस बार वर्चुअल संबोधित किया जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ के इतिहास में यह पहली बार होगा जब इसकी बैठक वर्चुअल होगी। जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी तब संयुक्त राष्ट्र अधिकार प्राप्त पत्र पर मात्र 50 देशों ने हस्ताक्षर किए थे।

इसका गठन विश्व कल्याण और शांति के लिए निरंतर काम करने के मकसद से किया गया था। इसका मकसद था अंतरराष्ट्रीय कानून को सुविधाजनक बनाने में सहयोग करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति और मानव अधिकार और विश्व शांति को बनाए रखना।

दरअसल संयुक्त राष्ट्र की कल्पना दूसरे विश्वयुद्ध के महाविनाश के बाद हुई थी। दूसरे विश्वयुद्ध के महाविनाश के बाद लोगों के मन में आया कि दुनिया द्वारा इस तरह के खतरे दुबारा न देखें इसलिए जो भी मुद्दे और मसले हो उन्हें बातचीत और मध्यस्थता के जरिए सुलझाया जाये। इसी के लिए संयुक्त राष्ट्र का गठन किया गया था।

जैसा कि मालूम है द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत 1939 में हुई थी और यह 1945 के अंत में समाप्त हुआ था। इस विश्वयुद्ध के समाप्त होते होते जापान पर अमेरिका ने 2 परमाणु बम गिराए थे जिससे भयंकर तबाही मची थी।

6 साल तक चले इस विश्वयुद्ध में लाखों लोग मारे गए थे। द्वितीय विश्वयुद्ध इतना भयंकर था कि लोगों के मन में यह कल्पना जागी कि दोबारा दुनिया के सामने ऐसी नौबत न आये। इसलिए किसी ऐसी संस्था का गठन किया जाए जो दुनिया को विनाश से बचा सके और जिसकी बात् दुनिया के सभी देश माने।

संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन दूसरे विश्व युद्ध के विजेता देशों ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय संघर्ष को हस्तक्षेप करने के मकसद से स्थापित किया था। इसकी संरचना में सुरक्षा परिषद को सबसे शक्तिशाली माना गया है, जिसमें अमेरिका,फ्रांस, रूस और ब्रिटेन जैसे देश शामिल थे।

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय इसके मात्र 50 देश सदस्य थे और आज इसके 193 सदस्य हैं। संयुक्त राष्ट्र का सबसे नया सदस्य देश दक्षिण सूडान है जो कि संयुक्त राष्ट्र में 11 जुलाई 2011 को शामिल हुआ है। इसमें दुनिया के वे सभी देश शामिल हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त है।

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संयुक्त राष्ट्र में आम सभा के अलावा सुरक्षा परिषद, आर्थिक व सामाजिक परिषद, सचिवालय और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय शामिल है। हालांकि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भी ऐसी कोशिश की गई थी कि ऐसा कोई गठन बनाया जाए जो दुनिया का नेतृत्व करें। 1929 में एक राष्ट्रीय संघ का गठन भी किया गया था लेकिन यह पूरी तरह से प्रभावहीन रहा और बाद में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र का गठन किया गया।

संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा फायदा यह रहा है कि विपरीत परिस्थितियों में यह अपने सदस्य देशों की सेनाओं को शांति संभालने के लिए तैनात कर सकता है। इसमें विभिन्न देशों की सेना मिलजुल कर काम करती है और अंतरराष्ट्रीय शांति स्थापित करती हैं।

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वर्तमान समय में शांति सेना में सबसे बड़ा सहयोगी देश भारत है। संयुक्त राष्ट्र की यह सेना दुनिया के उन देशों में काम कर रही है जहां पर विभिन्न गुटों में संघर्ष चल रहा है और आम नागरिक परेशान हो रहे हैं। उन्हें यह सेना स्वास्थ्य सेवाएं और जरूरी चीजें उपलब्ध करवाते हैं।

26 जून 1945 को जब संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के लिए संविधान पर हस्ताक्षर हो रहे थे तब उसमें 50 सदस्य देशों में भारत भी शामिल था जिसने यूएन चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे।

हेडक्वार्टर और भाषा :-

संयुक्त राष्ट्र का हेड क्वार्टर (मुख्यालय) अमेरिका के न्यूयॉर्क में है। इसकी इमारत को एक अंतरराष्ट्रीय शिल्पकारों के समूह ने बनाया था। संयुक्त राष्ट्र में सिर्फ 6 भाषाओं को स्वीकृति प्रदान की गई है, जिसमें अरबी भाषा, चीनी भाषा, अंग्रेजी भाषा, फ्रांसीसी भाषा, रूसी भाषा और स्पेनिश भाषा है। लेकिन इसके संचालन के लिए सिर्फ इंग्लिश और फ्रांसीसी भाषा को ही मान्यता प्राप्त है।

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भारत का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी भाषा को भी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल करना चाहिए क्योंकि हिंदी भाषा विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली दूसरी भाषा है।

इसलिए कई अवसरों पर भारत के कई नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में हिंदी भाषा में ही संबोधन भी किया है। पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने 1977 में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में हिंदी भाषा में भाषण दिया था।

उसके बाद वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सितंबर 2014 में हिंदी में भाषण दिया। उसके बाद तत्कालीन विदेश मंत्री रह चुकी सुषमा स्वराज ने भी अक्टूबर 2015 और सितंबर 2016 में अपने भाषण को हिंदी भाषा में ही दिया था।

 

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