कोरोना वायरस महामारी से उभरती दिख रही वैश्विक अर्थव्यवस्था
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कोरोना वायरस महामारी से उभरती दिख रही वैश्विक अर्थव्यवस्था

कोरोना वायरस महामारी से भारत ही नही बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। लॉकडाउन की वजह से विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था पूरी तरीके से ठप पड़ चुकी थी।

लेकिन अब धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार देखने को मिल रहा है। अगर बात् भारत की अर्थव्यवस्था की करे तो एक दशक पहले भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं के शिखर पर पहुंचने को था, लेकिन वर्तमान हालात से यही लग रहा है कि अब भारत को बांग्लादेश जैसे देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी।

भारत का औद्योगिक करण उत्पादकता के साथ बढ़ा है और समय पूर्व औद्योगिकरण की स्थिति से बचने के लिए एक मौलिक और मजबूत मॉडल की आवश्यकता भी महसूस करी जाती रही है।

विनिर्माण और सेवा दोनों क्षेत्र में लचीलापन के चलते नौकरियों और प्रति व्यक्ति आय दोनों को मिलाने के बाद भी किया काफी कम है।

हालांकि इसका प्रभाव अलग है और अपने आप में महत्वपूर्ण है। सेवा क्षेत्र विकास के प्रत्येक चरण में कम नौकरियां पैदा कर रहा है, जिसके चलते प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर घट रही है। वही इसके विपरीत अगर देखें तो निर्माण एक विकसित एस्केलेटर के रूप में काम कर रहा है।

विनिर्माण क्षेत्र पिछड़ी अर्थव्यवस्था के लिए समानांतर प्रभाव और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के रूप में दुनिया के सामने आया है जिसमें असंगठित क्षेत्र का उत्पादन और न्यूनतम लागत, बेरोजगारी का बढ़ना, छोटे उद्यमियों की संख्या में बढ़ोतरी होना, न्यूनतम जीडीपी अनुपात, विकास जैसी कई विशेषताएं होती हैं। कई अन्य आर्थिक और सामाजिक कारक भी इससे प्रभावित होते हैं।

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भारत एक विशाल अर्थव्यवस्था वाला देश है। ऐसे में भारत अपने जनसंख्या के साथ अर्थव्यवस्था के विनिर्माण के मध्यवर्ती चरणों को निकाल कर सकता है।

भारत के नीति निर्माताओं को यह देखना जरूरी हो गया है कि 21वीं सदी में विकास और नौकरियों के बीच संबंध स्पष्ट हो। इसलिए सेवा आधारित अर्थव्यवस्था पर ज्यादा जोर देना होगा।

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भारत के बारे में कहा जाता है कि भारतीय अफ्रीकी लोगों की तरह नही जी सकते हैं न ही अपने पड़ोसी देश चीन के इतना समृद्ध हो सकते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था मध्यम आय की स्थिति की है, जिसे कुशलता और संपन्नता के बीच बांटा जाता है।

एक तरफ तेजी से भुखमरी को कुशलता वाली अर्थव्यवस्था के द्वारा कम किया जा रहा है तो दूसरी ओर विकसित अर्थव्यवस्थाओं से प्रतिस्पर्धा के लिए संघर्ष देखा जा रहा है। कॉर्पोरेट सेक्टर में भी नियामक नीतिगत उत्तल पुथल देखने को मिल रहा है।

आर्थिक असमानता एक अभिशाप :-

भारतीय अर्थव्यवस्था को पिछड़ने में सबसे बड़ी समस्या आय असमानता और वर्ग वितरण है जो की मांग से सृजन के लिए मजबूर करती है, जिसका परिणाम यह होता है कि विकास का अभाव देखा जाता है।

असमानता एक अभिशाप की तरह है क्योंकि इससे मध्यम वर्ग की गतिशीलता धीमी पड़ जाती है और उन्हें गुणवत्तापूर्ण उत्पादों के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ जाता है।

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भारत में कौशल ही पिछले साल की नई मुद्रा की तरह बन रहा है। अर्थव्यवस्था इससे प्रोत्साहित होती है और उत्पादकता बढ़ती है जिससे लाभदायक बाजारों में प्रवेश करना आसान बन जाता है।

उत्पादकता से लेकर उच्च उत्पादकता के क्षेत्र तक नया दृष्टिकोण लाने और लोगों का ध्यान स्थानांतरण करने और संसाधनों का सही आवंटित करने की जरूरत महसूस की जा रही है क्योंकि उन संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा उच्च उपज और उच्च संभावित क्षेत्रों में लाना जरूरी है जो मूल्यवर्धन को आगे बढ़ाने का काम करें, इसके साथ ही संसाधनों के समुचित वितरण में तकनीक को भी बढ़ावा देना होगा जिससे समावेशी विकास को बढ़ावा मिल सके।

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