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Thursday, January 21, 2021

Food Security में सबसे बड़ा खतरा बन रहा बढ़ता हुआ ऊसर क्षेत्र

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हमारे देश में जिस तेजी से ऊसर क्षेत्र बढ़ा रहा है, यह खेती के साथ-साथ Food Security के लिए भी बड़ा संकट उत्पन्न कर सकता है।

भारत में खराब तौर तरीके से की जाने वाली खेती की वजह से ऊसर भूमि तेजी से बढ़ रही है। कृषि वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि खेती करने का यदि यही तौर तरीका अपनाया जाता रहा और यही हाल बना रहा तो आने वाले सालों में स्थिति और बिगड़ जाएगी।

वैज्ञानिकों ने कहा है कि साल 2030 तक ऊसर भूमि का क्षेत्र बढ़कर दुगना हो सकता है। मिट्टी संरक्षण के उपायों के जरिए ही ऊसर खेती की जमीन को खेती योग्य भूमि में बदला जा सकता है।

खेती वाली जमीन को बंजर होने से बचाने की जरूरत है, कृषि क्षेत्र में विविधीकरण के तहत कार्यवाही करने की जरूरत है। वैज्ञानिकों की सलाह मानकर यदि जलवायु आधारित खेती नही की जाती है तब समय के साथ यह खतरा और तेजी से बढ़ेगा।

कृषि मंत्रालय के आंकड़े की मानें तो देश में 67.3 लाख हेक्टेयर रकबा क्षेत्र में तब्दील हो चुका है, जिसमें से 13.7 लाख हैक्टेयर हिस्सा अकेले उत्तर प्रदेश में ही ऊसर में तब्दील हो गया है।

केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान और  Indian Council of Agricultural Research  (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ) ने बढ़ते हो ऊसर क्षेत्र को लेकर आशंका जताई है कि साल 2030 तक ऊसर क्षेत्र बढ़कर 1.55 करोड़ हेक्टेयर हो सकता है।

बता दें कि फिलहाल भारत में 15.97 करोड हेक्टेयर भूमि पर खेती की जा रही है, जिसमें से 87 लाख हेक्टेयर भूमि संचित है जो कि विश्व में सर्वाधिक बताई जाती है।

 बढ़ता हुआ ऊसर क्षेत्र
बढ़ता हुआ ऊसर क्षेत्र

Soil Conservation Society Of India  के अध्यक्ष डॉ सूरजभान ने बढ़ती ऊसर भूमि और भूमि के घटती उर्वरकता और भूमि में बढ़ते नमक की मात्रा को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि,  रासायनिक खाद और पेस्टिसाइड के बेहिसाब प्रयोग के चलते ही मिट्टी की गुणवत्ता खराब हुई है, साथ ही सिंचाई के अवैधानिक तरीके की वजह से भी मिट्टी की उर्वरता खराब हो रही है।

उन्होंने विभिन्न कृषि उत्पादक राज्य मे इसे लेकर गंभीरता न होने के चलते चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि अब ऊसर भूमि के सुधार के लिए जल्द से जल्द विशेष अभियान चलाया जाना चाहिए और सरकार को चाहिए कि भूमि उपयोग नियामक अधिनियम बनाए, जिससे किसान के साथ-साथ भूस्वामी भी प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक हो सके।

Natural Resources के विशेषज्ञ वैज्ञानिक कृषि वैज्ञानिक डॉ संजय अरोरा ने ऊसर भूमि सुधार के लिए एक जिपकिट बनाया है जिसके जरिए भूमिका परीक्षण करके उसमें जिप्सम की सही मात्रा आसानी से ज्ञात की जा सकती है।

यह भी पढ़ें : ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार जापान और मालदीव सबसे ईमानदार देशों में शामिल है

मालूम हो कि वर्तमान में मिट्टी में जिप्सम की मात्रा जाने के लिए जिस प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है वह काफी जटिल और अधिक समय लेने वाली है और ज्यादातर प्रयोगशालाओं में इस प्रकार के मिट्टी परीक्षण की सुविधाओं का अभाव भी है।

लेकिन जिपकिट के व्यवसायिक उत्पादन को अगर बढ़ावा दे कर इसका प्रयोग किया जाए तो इसे किसानों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी और Green land Reform में इसका महत्वपूर्ण रोल हो सकेगा।

डॉक्टर अरोडा ने कहा है कि देश में जगह-जगह जलभराव की समस्या है जिसकी वजह से भी भूमि में लवणता बढ़ रही है और भूमि की उर्वरता घट रही है और वह बंजर हो रही है।

इस पर यथासंभव जल्दी अंकुश लगाने की जरूरत है। ज्यादा सिंचाई वाली फसलों की वजह से भी भूमि को नुकसान होता है। पंजाब और हरियाणा के क्षेत्र में धान की खेती के चलते वहां की जमीनों को भी काफी नुकसान झेलना पड़ रहा है उनमें उर्वरक ता घट रही है।

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