बकरीद त्योहार का महत्व
नजरिया

आइए जाने बकरीद त्योहार का महत्व इसकी धार्मिक मान्यता

बकरीद को ईद उल अजहा के नाम से भी जाना जाता है। यह इस्लामी कैलेंडर के अंतिम माह ‘जु-अल-हिज्ज’ में पड़ता है। इस साल बकरीद का त्यौहार चांद दिखने पर 31 या 1 अगस्त को मनाया जाएगा। इस्लाम में बकरीद एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। इस्लाम की मान्यता के अनुसार आपको जो चीज सबसे ज्यादा प्यारी होती है उसकी इस दिन कुर्बानी दी जाती है।

यह त्यौहार भारत ही नही बल्कि दुनिया के विभिन्न देशों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन नमाज अता करने के बाद लोग बकरे की कुर्बानी देते हैं। इस्लाम धर्म का कहना है कि इस दिन जो चीज तुम्हें सबसे प्यारी हो उसे अल्लाह की राह में खर्च करो यानी कि  नेकी और बलाई जैसे कामों में खर्च करने को कहा जाता है।

लेकिन इस दिन सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने के बजाय लोग बकरे की कुर्बानी क्यों देते हैं, इसके पीछे क्या वजह है चलिए जानते हैं बकरीद के दिन बकरे की कुर्बानी की कहानी : –

इस्लाम धर्म में कुर्बानी की परंपरा पैगंबर हजरत इब्राहिम की देन है। ऐसी मान्यता है कि इब्राहिम अलैहिस्सलाम की कोई संतान नहीं थी और वह अल्लाह से औलाद के लिए दुआ मांगते थे। अल्लाह ने उनकी मिन्नत सुनकर उन्हें औलाद दे दी और हजरत इब्राहिम ने अपने इस बच्चे का नाम ‘इस्माइल’ रखा।

हजरत इब्राहिम अपने बेटे से बहुत प्यार करते थे इसी बीच एक रात आई और अल्लाह ताला ने इब्राहिम से कहा कि वह अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दे। इब्राहिम ने एक-एक करके अपने सारे जानवरों की कुर्बानी दे दी। लेकिन इसके बाद फिर से अल्लाह उनके सपने में आए और फिर से आदेश दिया कि अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दो।

क्योंकि हजरत इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल से बहुत प्यार करते थे और अल्लाह के आदेश का पालन करते हुए हजरत इब्राहिम ने अपनी सबसे प्यारी चीज अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने का फैसला किया और इसके लिए वह तैयारी करने लगे।

Eid

हजरत इब्राहिम अपने बेटे की हत्या नही देख सकते थे तो इसलिए उन्होंने अपनी आंख पर पट्टी बांध ली और उसके बाद अपने बेटे की कुर्बानी देने लगे। हजरत इब्राहिम ने जब कुर्बानी दे दी और कुर्बानी बाद अपनी आंख खुली तब उन्होंने देखा कि उनका बेटा इस्माइल जीवित है और यह देखकर वह बेहद हैरान हो गए और अपने बेटे को जिंदा देखकर बेहद खुश भी हुए।

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ऐसा कहा जाता है कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के सच्ची नियत और निष्ठा देखकर उनके बेटे की जगह बकरा रख दिया था और तभी से ही यह परंपरा चली आ रही है कि लोग बकरीद के दिन बकरे की कुर्बानी करते हैं और बकरे की कुर्बानी के साथ ही इस दिन लोग हजरत इब्राहिम द्वारा दी गई कुर्बानी को याद करते हैं।

मुस्लिम लोग बकरीद की तैयारी के लिए एक साल तक बकरे को अपने बच्चे की तरह पालते पहुंचते हैं और बकरीद के दिन खुदा की राह में कुर्बानी करते हैं।

बकरीद पर कुर्बानी से लोगो मे यह संदेश यह जाता है कि हजरत इब्राहिम जिस तरह से मानव सेवा के लिए अपने जीवन को दान कर दिया और रास्ते में आने वाली सभी परेशानियों और मुश्किलों का सामना करें और उसकी शिकायत भी नही की। ठीक इसी तरह हर इंसान हर परिस्थिति में स्वयं लड़ना चाहिये और लोगो की जितना हो सके मदद करनी चाहिए।

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