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Thursday, January 21, 2021

अब खुशहाली मापने का आधार नहीं रह गयी है बढ़ती हुई जीडीपी..!

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लंबे समय से इस बात को लेकर बहस हो रही है कि अर्थव्यवस्था के मापन के रूप में सकल घरेलू उत्पाद Gross Domestic Product- जीडीपी) कितना प्रभावी है ? अब दुनिया भर में खुशहाली के मापक के रूप में जीडीपी को शंशय की नजर से देखा जाने लगा है।

इसे भारत के उदाहरण से भी लोग समझ सकते हैं। अभी हाल में ही कुछ स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों ने भारत की उच्च जीडीपी को लेकर सवाल खड़े किए है। इसके अलावा ऊंची आर्थिक विकास दर के बावजूद इस बात को लेकर बहस जारी है कि संपन्नता नजर क्यों नही आ रही है। आज भी भारत में 22 करोड़ से भी अधिक आबादी गरीबी और बेरोजगारी को झेल रही है। यह एक समांतर घटना हो गई है।

बहुत सारी सरकारों द्वारा लोगों की खुशहाली पर ध्यान देना शुरू हो गया है। दिल्ली में खुशी और खुशहाली के विषय को स्कूल के एक विषय के रूप में पढ़ाया जाना शुरू हो गया है। वही हमारे पड़ोसी देश भूटान भी लोगों के विकास के लिए खुशहाली सूचकांक को प्राथमिकता दे रहा है।

सवाल यह है कि क्या अर्थव्यवस्था के परंपरागत मापन से लोगों के समग्र विकास की झलक दिखाई नही दे रही है ? यदि नही दे रही है तो ऐसा क्यों है ? यूनाइटेड नेशन एनवायरनमेंट प्रोग्राम के प्रमुख पर्यावरण अर्थशास्त्र पुष्पम कुमार का कहना है कि कई सालों से अर्थव्यवस्था को मापने की दिशा में लगातार बदलाव हो रहा है और इसके लिए 140 देशों के समावेशी संपन्नता को मापने की तैयारी की जा रही है।

संपन्न देशों में लोगों की आमदनी के बजाय उनके सामाजिक, परिस्थिति और स्वास्थ्य के नजरिए को मापने पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा है। अर्थशास्त्री पुष्पम का कहना है कि आज दुनिया संपत्ति और आय के बीच उलझ गई है, क्योंकि यह दोनों ही कारक लोगों की आर्थिक खुशहाली और पूंजी को प्रदर्शित करने के अलग अलग माध्यम बन गए हैं।

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यह जीडीपी आय का एक मात्रक है लेकिन इसे संपत्ति का मापक नही कहा जा सकता है। जीडीपी से किसी देश की वस्तुओं और सेवाओं के मूल के बारे मेजानकारी मिलती है, लेकिन इससे प्राकृतिक पूंजी और संपत्ति की जमा पूंजी के बारे में स्पष्ट जानकारी नही मिलती है। अगर किसी भी अर्थव्यवस्था का अंतिम लक्ष्य खुशहाली को बढ़ावा देना है तब उस अर्थव्यवस्था को जीडीपी में मनुष्य की प्रगति का खराब मापक माना जाएगा।

इंक्लूसिव रिपोर्ट जो कि साल 2018 में प्रकाशित हुई उसके अनुसार किसी भी देश के विकास को सिर्फ जीडीपी से नहीं आंका जा सकता बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और परिस्थिति की पूंजी इसके आधार होने चाहिए। बता दें कि इंक्लूसिव रिपोर्ट खुशहाली के आधार पर मापी गई है।

gdp

इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए 140 देशों का सर्वेक्षण किया गया, जिसमें 44 देशों में 1998 के बाद प्रति व्यक्ति समावेशी पूंजी इंक्लूसिव वेल्थ आय में वृद्धि होने के बावजूद कमी दर्ज की गई है। जिसका मतलब यह है कि जीडीपी आधारित तेजी से विकसित होते आर्थिक विकास वाले देश में इन्क्लूसिव बढ़ोतरी नहीं हो रही है।

इससे यह भी संकेत मिलता है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के रूप में आर्थिक विकास भी प्रभावित हो रहा है। मालूम हो कि 1990 के बाद इंक्लूसिव वेल्थ में प्राकृतिक पूंजी की हिस्सेदारी कम होती गई है, वहीं मानवीय और भौतिक पूंजी में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

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बात अगर भारत की करें तो 2005 से 2015 तक लगभग सभी राज्यों में जीडीपी की औसत दर 7से 8% तक रही है लेकिन 11 राज्यों में प्राकृतिक पूंजी में गिरावट दर्ज की गई है, जिसमें 13 राज्य में 0 से 5% की मामूली वृद्धि दर्ज हुई और केवल तीन राज्यों में प्राकृतिक पूंजी में 5% से अधिक की वृद्धि देखी गई है। इसलिए आर्थिक विकास का यह मॉडल देश के दीर्घकालीन विकास के लिए अच्छा नही है।

एक तरह से कह ले कि बढ़ती हुई जीडीपी से यह पता चलता है कि संपत्ति में असमानता दिन-ब-दिन बढ़ रही है, और केवल मुट्ठी भर लोगों के पास ही अधिकतर आय केंद्रित होती जा रही है।

ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि देश लगातार प्राकृतिक को नुकसान पहुंचा रहा है और निजी आय लगातार बढ़ रही है और यह प्राकृतिक संसाधन ही गरीबों की सबसे बड़ी पूंजी है।

प्राकृतिक पूंजी से कुछ लोगों को तो आर्थिक फायदा पहुंचेगा, लेकिन आर्थिक विकास के बावजूद गरीब लोग और बिछड़ते जा रहे और अमीर व्यक्ति और ज्यादा अमीर होते जाएंगे। इसलिए जीडीपी को किसी भी देश की खुशहाली का मापक नही माना जा सकता है!

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