जानते है कस्तूरबा ने अंतिम समय में गाँधी जी से क्या कहा था

जानते है कस्तूरबा ने अंतिम समय में गाँधी जी से क्या कहा था

गांधीजी के बारे में उनके अंतिम शब्द सब जानते हैं कि “हे राम” था । लेकिन गांधी जी की पत्नी कस्तूरबा ने अंतिम समय में गाँधी जी से क्या कहा था, इसके बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं । मालूम हो कि देश की राजधानी में कस्तूरबा गांधी मार्ग, कस्तूरबा विधानसभा क्षेत्र, यमुनापार शाहदरा में कस्तूरबा नगर और किंग्सवे कैंप में गांधी कस्तूरबा कुटीर है ।

कस्तूरबा ने अपने अंतिम समय में गांधी जी से कहा था “मैं अब जाती हूं, हमने बहुत सुख भोगे, दुख भी भोगे, मेरे बाद रोना मत, मेरे मरने पर तो मिठाई खानी चाहिए” और यही शब्द कहते-कहते कस्तूरबा के प्राण पखेरू उड़ गए । वनमाला परीख और सुशीला नैयर की पुस्तक “हमारी बा” में  इस घटना का  वर्णन है ।कस्तूरबा इस संसार को २२ फरवरी १९९४ को छोड़ गई । उन्होंने अंतिम साँस पुणे के आगा खान पैलेस में ली ।

उस समय उनकी आयु 74 वर्ष की थी । गुजरात के कठियावाड़ा के पोरबंदर नगर में वर्ष 1868 में अप्रैल के माह में कस्तूरबा का जन्म हुआ था । बचपन में ही कस्तूरबा का विवाह गांधी से हो गया था । गांधी जी ने अपनी कई लेखों में कस्तूरबा का जिक्र किया है । एक बार गांधीजी ने कस्तूरबा के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए लिखा कि “मुझे लगता है कि कस्तूरबा के प्रति जनता के आकर्षण का मूल कारण स्वयं को मुझ में विलीन करने की क्षमता थी ।

मैंने कभी इसके लिए आग्रह नहीं किया था । लेकिन जैसे-जैसे मेरे सार्वजनिक जीवन का विस्तार हुआ मेरी पत्नी के व्यक्तित्व में परिवर्तन आया और उसने आगे बढ़ कर स्वयं को मेरे काम में खपा दिया ।

समय बीतने के साथ मेरा जीवन और जनता की सेवा एक हो गई । उसने धीरे-धीरे स्वयं को मुझ में समाहित कर दिया । शायद भारत की धरती एक पत्नी के होने के इसी गुण को सबसे अधिक पसंद किया जाता है । मेरे लिए उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यही है” । किंग्सवे कैंप में गांधी जी अपने दिल्ली प्रवास के दौरान इसी परिसर में रुका करते थे । कस्तूरबा अपने बेटे देवदास और अन्य लोगों के साथ यहां पर काफी समय तक रही । 1938 में कस्तूरबा के बीमार होने पर बापू ने सुशीला को बुलाया जो कि उस वक्त डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही थी ।

गांधी जी ने सुशील को दिल्ली में तार भेजकर बा के इलाज के लिए वर्धा आने का अनुरोध किया था और इसी बीच वह खुद ही रेल से दिल्ली आ गई । सुशील अंबा की चिकित्सा जांच के लिए 1 दिन में दो से तीन बार देखने जाती थी । कस्तूरबा पुस्तक में बा से दिल्ली में अपनी मुलाकात का वर्णन करते हुए सुशील ने लिखा है “बा ने उन्हें कहा कि वे उनके साथ कुछ दिन रहना चाहती हैं , तुम मुझे सुबह शाम प्रार्थना गाकर सुनाना तो मुझे ऐसा लगेगा कि मैं सेवाग्राम के आश्रम में ही हूं” । इसके बाद सुशीला उन्हें अस्पताल से अपने कमरे पर ले गई ।

हरिजन सेवक संघ का मुख्यालय दिल्ली के किंग्सवे कैंप में ही स्थित है । पहले इस परिसर के अंदर एक भवन था जहां पर एक कमरे वाले आश्रम से गांधी जी ने अपनी गतिविधियों को शुरू किया था ।  गांधीजी के बिरला हाउस स्थानांतरित होने से पहले इसी के करीब बने कस्तूरबा कुटीर में कस्तूरबा ने अपने बच्चों के साथ अप्रैल 1946 और जून 1947 तक रही ।

इस कैंप में हरिजन सेवक संघ की स्थापना होने के बाद यह गांधीजी के ठहरने का स्थान बन गया था । 1932 में गांधी जी ने भीमराव अंबेडकर के साथ हुए पूना पैक्ट के परिणाम स्वरूप हरिजन सेवक संघ की स्थापना की थी । इस संस्था का लक्ष्य समाज से छुआ छूत को मिटाने और उसके उससे प्रभावित व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा में लाना था ।

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