क्या पैसे से खुशी हासिल की जा सकती है? क्या कहता है शोध

क्या पैसे से खुशी हासिल की जा सकती है? क्या कहता है शोध

क्या पैसे से खुशी हासिल की जा सकती है? क्या कहता है शोध

अक्सर हर किसी के मुँह से यह कहते हुए सुना जा सकता है कि हमें अपनी जिंदगी में बेहद खुश रहना चाहिए। मुश्किलें जिंदगी में चाहे जितनी आए कभी भी हिम्मत नहीं होनी चाहिए और हर कोई खुद को खुश रखने की हर कोशिश करता है।

आज के दौर में लोगों के पास खुश रहने की कोई वजह है। लेकिन ऐसे भी कई वजह हैं जो लोगों से उनकी खुशियां छीन लेता है।

लेकिन एक नए शोध से पता चलता है कि पैसे से खुशी हासिल की जा सकती है। जी हां, यह बिल्कुल सच है। एक नए शोध में तो यही कहा गया है। आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से :-

हाल में ही एक शोध प्रकाशित किया गया है जिसे जनरल आफ प्रेसिडिंग द नेशनल अकैडमी आफ साइंसेज में पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय के कुछ वरिष्ठ शोधकर्ताओं ने मिलकर एक रिपोर्ट तैयार की है।

उन्होंने यह रिपोर्ट 7 साल में अमेरिका के 33 हजार से भी अधिक वालंटियर के आंकड़े के विश्लेषण पर किया है।

शोध का निष्कर्ष उनके जीवन पर नजर रख कर निकाली गई है। इसमें उन वॉलिंटियर्स के जीवन पर नजर रखी गई है जिनके पास ढेर सारा पैसा है और खुशियां खरीदने का अच्छा अनुभव भी है।

टेक्नोलॉजी की मदद से शोध में शामिल सभी वालंटियर का रियल टाइम डाटा लिया गया। जिससे उन्होंने इन लोगों के जीवन की गहराई के बारे में कई सारी बातें पता चली।

इन वॉलिंटियर्स से कम से कम 30 बार Multiple choice यानी बहुविकल्पीय प्रश्न पूछे गए थे और उसी हिसाब से उन्हें रेटिंग देनी होती थी।

इन सवालों में कई तरह के प्रश्न शामिल थे। जैसे आप अभी कैसा महसूस कर रहे हैं? कुल मिलाकर आप अपने जीवन से कितने संतुष्ट हैं?

समय-समय पर उनसे वित्तीय सुरक्षा के बारे में उनकी समझ और उनके जीवन पर उनके नियंत्रण जैसे सवाल भी पूछे गए थे।

इसी पत्रिका में प्रकाशित एक शोध जो कि 2010 में प्रकाशित हुआ था, के शोधकर्ता डेनियल का कोह्नमैन और एंगल ने अपने विचार दिए थे।

जो कि नोबेल पुरस्कार विजेता भी रह चुके हैं, ने कहा कि अमेरिका में 2010 में $7500 की सालाना आय यानी कि लगभग ₹54000 पाने वाले खुश और संतुष्ट रहते हैं।

वहीं दूसरी तरफ किलिंगवर्थ अपने निष्कर्ष में कहते हैं कि लोगों की खुसी बढ़ती रही है क्योंकि लोगों की वार्षिक घरेलू आय 480000 डॉलर (लगभग 3.4 करोड़) से अधिक हो गई।

किलिंगवर्थ ने अपने और साल 2010 में हुए शोध में अंतर भी बताया है। उन्होंने कहा कि हाल में ही स्मार्ट फोन के उपयोग के माध्यम से लोगों के वास्तविक समय को देखना संभव हो गया है।

जबकि साल 2010 में यह संभव नही था। साल 2010 के सर्वेक्षण के माध्यम से देखा गया था कि पिछले एक सप्ताह या एक महीने में व्यक्ति कैसे महसूस करते हैं।

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लेकिन 2020 के सर्वेक्षण में लोगों के स्मार्टफोन के जरिये उनके गतिविधियों को प्रतिदिन की निगरानी की गई। ऐसे में अपने अध्ययन में किलिंगवर्थ इस बात को कहते हैं कि वाकई में पैसों से खुशियों को खरीदा जा सकता है।

काफी हद तक यह बात वास्तविक जीवन में भी लागू होती है। क्योंकि यह सच है कि पैसे से काफी हद तक खुशियों को खरीदा जा सकता है।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पैसा सब कुछ नहीं है। पैसे से हर खुशी नही खरीदी जा सकती। पैसा बस जीवन जीने का एक जरिया है।

जब तक हम इसे अपने जरूरत की तरह इस्तेमाल करेंगे तब तक तो ठीक है। लेकिन दिन रात सब कुछ छोड़कर पैसे के पीछे भागना धीरे धीरे हमारी खुशियों को छीनने लगता है क्योकि इंसान पैसे के चक्कर मे अपना शुकुन खो देता है।