गरीब और विकासशील देशों की विषम परिस्थितियां इन देशो के लोगों को बना रही कोरोना वायरस से सुरक्षित

कोरोना वायरस की दूसरी लहर में युवाओं को भी पढ़ रही ऑक्सीजन की जरूरत

कोरोना वायरस की दूसरी लहर में युवाओं को भी पढ़ रही ऑक्सीजन की जरूरत

वैश्विक स्तर पर कोरोना वायरस के मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन आज भी दुनिया के कई गरीब और पिछड़े देश ऐसे हैं जो इस महामारी का रौद्र रूप से अभी भी बचे हुए हैं।

एक तरह से अछूते हैं। वहां पर विकसित और अमीर देशों की तुलना में कोरोना वायरस से संक्रमित होने और कोरोना वायरस से होने वाली मौतों का आंकड़ा बेहद कम है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इन देशों में कोरोना से कम मृत्यु होने कारण इन लोगो का अपेक्षाकृत युवा होना है और इन देशों में कोरोना वायरस के कम घातक रूप मौजूद हैं।

दरअसल गरीब और विकासशील देशों में लोग आभाव के जिंदगी जीते हैं और मेहनत ज्यादा करते है और कही न कही यही वजह है कि यह लोग कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत ज्यादा सुरक्षित हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी वजह यह है कि इन देशों के लोग का जीवन कठोर परिस्थितियों में रहता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ देश जहां पर गरीबी और अन्य बीमारियों काफी ज्यादा है लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग कोरोना वायरस महामारी की चपेट में नहीं आए हैं।

महामारी की शुरुआत के तौर पर गरीब देश खासकर के आफ्रिका में महामारी के भीषण प्रसार को लेकर वैज्ञानिक काफी चिंतित थे क्योंकि यहां का समाज भीड़ से भरा है और स्वच्छता के लिहाज से भी यहां के हालात ठीक नहीं है और यहां के स्वास्थ्य प्रणाली की गुणवत्ता भी अन्य देशों की तुलना में बेहद कमजोर थी।

लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि संभवत इन लोगों का जीवन चुनौतीपूर्ण होने की वजह से कोरोना वायरस से लड़ने में यह लोग सक्षम है।

दक्षिण अफ्रीका में 6 लाख कोरोना वायरस के मामले अब तक सामने आए हैं, वहीं अगर ब्रिटेन से इसकी तुलना करें तो ब्रिटेन में लगभग दुगनी मामले सामने आ चुके हैं।

दक्षिण अफ्रीका में कोरोना वायरस से अब तक सिर्फ 14,000 मौतें हुए हैं। ब्रिटेन में 40,000 से भी ज्यादा लोग 40 वर्ष की औसत आयु में है और आधे लोग बूढ़े हैं और आधे जवान हैं। वहीं अगर अफ्रीकी देशों की बात करें तो इन देशों के लोगों की मध्य आयु सिर्फ 28 साल है और ब्रिटेन के मध्य आयु 40 साल है।

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जिससे यह पता चलता है कि औसतन अफ्रीकी देशों के लोग ज्यादा युवा हैं जिसकी वजह से कोरोना वायरस से मृत्यु दर यहां पर कम देखी जा रही है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन देशों के लोग कोरोना वायरस के संपर्क में अधिक आ सकते हैं क्योंकि ये लोग भीड़ भाड़ वाले इलाकों में रहते हैं, जहां पर संक्रामक बीमारियां बेहद तेजी से फैलती है।

वही वैज्ञानिक बार-बार सुझाव दे रहे हैं कि अन्य समान वायरस के संपर्क में आने से कोरोना वायरस के खिलाफ सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत मिल जाती है। अफ्रीका में दस लाख से कुछ अधिक मामले हैं लेकिन मौतों के आंकड़े सबसे कम अफ्रीकी देशों में ही देखी गई है। वहीं एशिया में भी कोरोना वायरस से मृत्यु दर सबसे कम है।

पाकिस्तान और नेपाल जैसे बेहद ग़रीब देशों में भी बड़ी संख्या में नए मामले आने के बाद अन्य देशों की तुलना में यहाँ मामले की स्थिति स्थिर बनी हुई है। इसके लिए यहां पर पहले पुरानी महामारी का लाभकारी योगदान है।

अफ्रीका में कोरोना वायरस से अभी 21 हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं जो कि यूरोपीय देशों की तुलना में 10 गुना कम है और अमेरिकी महाद्वीप की तुलना में 20 गुना से भी कम है। बता दें कि कोरोना वायरस के सर्वाधिक मामले यूरोप में 42 लाख और अमेरिका में 131 लाख मामले अब तक सामने आ चुके हैं।

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वैज्ञानिकों का कहना है कि जो लोग पहले से बीमारियों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके हैं जिनसे वे अपने अतीत में ग्रसित रहे हैं, ऐसे में कोरोना वायरस के प्रति उनके शरीर में प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो गई है। लोगों में संक्रमण बहुत ही मिलता जुलता होता है।

कोरोना के कमजोर स्ट्रेस की वजह से कफ और सर्दी ही कारण बन रहे हैं और यदि वे पहले से किसी कोरोना वायरस जैसी बीमारी से संक्रमित हो चुके हैं तब इसका यह अर्थ है कि वह कोरोना वायरस के गंभीर रूप से बीमार होने से बच सकते हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि ये लोग किसी भी संक्रमण से पूरी तरीके से बच सकते हैं।