रानी कर्णवती, हुमायूँ
राजनीति

रक्षाबंधन के मौके पर आइये जाने कैसे रानी कर्णवती ने जब राखी भेजी तो मुँहबोले भाई हुमायूँ ने अपना कर्तव्य निभाया

रक्षाबंधन को हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। हिन्दू धर्म मे रक्षाबंधन के त्योहार को भाई-बहन के अटूट रिश्ते के त्योहार के तौर पर मनाया जाता है। रक्षाबंधन के अवसर पर बहने अपने भाई के कलाई पर राखी बांधती हैं और अपने भाई की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं तो वहीं भाई भी अपनी बहन को वचन देता है कि वह उसकी हमेशा रक्षा करेगा।

इस रक्षाबंधन के त्यौहार को लेकर एक पौराणिक कथा भी काफी प्रचलित है। यह कथा रानी कर्णावती और महाराज हिमायू की है जिसका जिक्र कई लोग गीतों में भी किया जा चुका है। विशेष कर के राजस्थान के लोक गीतों में इसका जिक्र जरूर से सुनने को मिल जाता है।

कहा जाता है कि एक बार चित्तौड़ की महारानी कर्णवती ने हुमायूँ को राखी भेजी थी। रानी कर्णावती की राखी को पाकर हिमायू तुरंत अपनी मुंह बोली बहन रानी कर्णावती की रक्षा करने के लिए निकल पड़े थे।

यह कहानी मुगल शासन के समय की है। चित्तौड़ पर बहादुर शाह ने हमला कर दिया था और अपने राज्य को  बहादुर शाह के हमले से बचाने के लिए महाराजा राणासांगा की विधवा पत्नी रानी कर्णवती के पास तब इतनी शक्ति नहीं थी कि वह बहादुर शाह के हमले से अपने लोगों और अपने राज्य की सुरक्षा कर पाये तब रानी कर्णावती ने अपने मुँहबोले भाई  हुमायूं को राखी भेजी थी और उन्होंने हुमायूँ से अपनी मदद की गुहार लगाई थी।

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अब बहुत से लोगो के मन में यह सवाल भी जरूर आ सकता है कि रक्षाबंधन तो हिंदुओं का त्यौहार है और हुमायूँ तो एक मुस्लिम था। हुमायूं भले ही मुस्लिम था लेकिन रानी कर्णवती की राखी पा कर उसने धर्म को अलग रखकर रानी कर्णावती के राखी की लाज बचाने और उनकी मदद करने का फैसला किया और उनकी मदद के लिए तुरंत निकल पडा था।

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हुमायूं ने चित्तौड़ की रक्षा करने के लिए अपनी विशाल सेना लेकर चित्तौड़ की तरफ बढ़ गया और हाथी घोड़ों की सवारी के साथ हुमायूं को चित्तौड़ तक पहुंचने में काफी समय भी लग गया। बताया जाता है कि जब तक हुमायूँ चित्तौड़ पहुँचा तब तक रानी कर्णवती ने चित्तौड़ की बिरंगनाओ के साथ जौहर कर लिया था। यानी कि अग्नि में समा गई थी।

रानी कर्णवती के जौहर कर लेने के बाद बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर कब्जा जमा लिया था। जब हुमायूँ को इस बात की जानकारी हुई तो हुमायूँ बहुत दुखी हुआ और फिर हुमायूँ ने चित्तौड़ पर हमला करने का फैसला लिया था। इस हमले में हुमायूँ विजयी हुआ और बहादुर शाह के चंगुल से चित्तौड़ को आजाद करा लिया। इसके बाद हुमायूँ ने चित्तौड़ का शासन रानी कर्णवती के बेटे विक्रमजीत को शौप दिया था।

इस घटना के बाद से चित्तौड़ की महारानी रानी कर्णवती और हुमायूँ के बहन-भाई के रिश्ते को इतिहास में सम्मान के साथ याद किया जाता है और भाई बहन का यह रिश्ता इतिहास मे अमर बन गया।

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