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Thursday, January 21, 2021

यूनिसेफ के अनुसार दुनिया के दो तिहाई बच्चे सीसा (लेड) जैसे जहरीली धातु के साथ जीने को मजबूर

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सीसा (लेड) इंसानों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है इसलिए यह इन्सानों खास कर के बच्चों के लिये एक जहरीली घातु है। यूनिसेफ द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की लगभग दो तिहाई बच्चों की संख्या लेड धातु के जहर के साथ जीने के लिए मजबूर है।

इतनी बड़ी संख्या में बच्चे लेड जैसी घातु से प्रभावित हो रहे हैं, इसकी वजह लेड युक्त बैटरी के कचरे के डिस्पोजल करने में बरती जाने वाली लापरवाही है । यूनिसेफ ने इस तरह की लापरवाही के प्रति लोगों को आगाह करते हुए इसके डिस्पोजल को बेहतर बनाने की अपील की है।

यूनिसेफ और प्योर अर्थ के द्वारा संयुक्त रूप से एक रिपोर्ट निकाली गई है जिसका नाम है – “द टॉक्सिक ट्रुथ : चिल्ड्रंस एक्स्पोज़र टू लेड पॉल्यूशन अंडरमाइनस ए जनरेशन ऑफ पोटेंशियल”। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर के करीब 80 करोड बच्चों के ब्लेड में लेड पाया जा रहा।

दुनिया के एक तिहाई बच्चो के ब्लड में  5 माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर से ज्यादा मात्रा में लेड घुला हुआ पाया जा रहा है। 80 करोड़ बच्चो का मतलब है दुनिया की एक तिहाई बच्चों की संख्या यानी कि हर तीन में से एक बच्चा लेड (सीसा) धातु के जहर के साथ जी रहा है।

यूनिसेफ ने अपनी रिपोर्ट में आगाह किया है कि ब्लड में लेड की इतना ज्यादा मात्रा का होना मेडिकल ट्रीटमेंट के अंतर्गत आता है। इस रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि इनमें से आधे से ज्यादा बच्चे केवल एशियाई देशों में निवास करते हैं।

children

वही इस सम्बंध में प्योर अर्थ के अध्यक्ष का कहना है कि लेड धातु से सबसे ज्यादा कामगार मजदूर, उनके बच्चे और उनकी बस्तियों में सबसे ज्यादा जोखिम है क्योकि ये ज्यादातर ऐसी जगहों पर निवास करते है जहाँ साफ सफाई का अभाव रहता है और उनके पीने के पानी भी स्वच्छ नही होता उसमे भी लेड घुला हुआ पाया गया है क्योकि लेड युक्त बैटरियों के कचरे का निपटारा सही से न होने से ये आसपास के लोगो नुकसान पहुचाने  और पानी में घुल कर पानी को दूषित कर रहा है।

इसके लिए जरूरी है कि लेड युक्त बैटरियों का बेहद सुरक्षित तरीके से रिसाइकल किया जाये। इसके अलावा लेड युक्त बैटरियों को इधर उधर फेकने से इसके कचरे से होने वाले प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक करने की जरूरत है, जिससे लोगों और बच्चों को इसके खतरे से सुरक्षित रखा जा सके। इसलिए इसके रिसाइकल में निवेश करने के बहुत सारे फायदे हैं।

प्योर अर्थ की रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि लेड प्रदूषण से प्रभावित देश की सरकारें इसके संबंध में निगरानी के लिए और लोगो को जानकारी मुहैया कराने के लिए एक प्रणाली विकसित करे तथा इसके रोकथाम और नियंत्रण के लिए उपाय करें।

broken glass

यूनिसेफ का कहना है कि खून में लेड की मौजूदगी के शुरुआती लक्षण नजर नही आते हैं लेकिन यह बेहद खामोशी से बच्चों के स्वास्थ्य के साथ ही उनके मानसिक विकास को भी प्रभावित करता है और इसके परिणाम बेहद घातक होते हैं। यूनिसेफ और प्योर अर्थ की इस रिपोर्ट में वास्तविक परिस्थितियों का मूल्यांकन 5 देशों विशेष करके बांग्लादेश, जॉर्जिया, घाना, इंडोनेशिया, मेक्सिको में किया गया है।

यह भी पढ़ें : वातावरण में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड इंसानों की सोचने समझने की क्षमता पर डालता है असर

बता दें कि लेट में न्यूरोटॉनिक नामक तत्व पाया जाता है जो कि बच्चे के मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाता है और इसका इलाज भी संभव नही है। लेड धातु 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए बेहद खतरनाक होती है।

लेड घातु अगर बच्चो के खून में घुल जाता है तो इसके प्रभाव से मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार संबंधी परेशानियां उत्पन्न होती हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि  कम आय वाले देशों में लेड युक्त इस्तेमाल की गई बैटरी के डिस्पोजल का कोई सही तरीका नही है न ही डिस्पोजल करने की कोई अच्छी व्यवस्था है।

यही वजह है कम आय वाले पिछड़े और विकासशील देशों के बहुत से बच्चों के खून(ब्लड) में लेड जैसी धातु का जहर घुल रहा है।

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