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Saturday, February 27, 2021

आइए जाने किस लिए चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताता है

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भारत और चीन के बीच सीमा विवाद बहुत सालों से बना हुआ है। भारत के कुछ इलाके ऐसे हैं जिन्हें चीन अपने देश का हिस्सा मांनता है।  ऐसे ही भारत का एक राज्य अरुणाचल प्रदेश है जिसे चीन अपना हिस्सा कहता है।

अरुणाचल प्रदेश भारत का 24 वां राज्य है और भौगोलिक दृष्टि से यह पूर्वोत्तर क्षेत्र का सबसे बड़ा राज्य माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ सालों से चीन इसके पीछे पड़ा हुआ है। उसका कहना है कि अरुणाचल प्रदेश उसका हिस्सा है।

हालांकि चीन अरुणाचल प्रदेश के दक्षिण में स्थित तिब्बत को भी अपना हिस्सा बताता है। जबकि तिब्बत कई साल पहले ही खुद को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर चुका है। लेकिन चीन इस बात को नहीं मानता और तिब्बत पर अपना अधिकार जताता रहता है।

आइए जानते हैं कि आखिर चीन भारत के इस राज्य अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा कहता है और इसके पीछे इतिहास क्या रहा है?

सालों पहले शुरू शुरू में चीन अरुणाचल प्रदेश के उत्तरी हिस्से तवांग को अपना हिस्सा कहता था । मालूम हो कि तवांग हिमाचल प्रदेश के उत्तर में स्थित बेहद खूबसूरत शहर है और समुद्र तल से तवांग की ऊंचाई 3500 मीटर है। यहीं पर बौद्ध धर्म का विशाल बौद्ध मंदिर बना हुआ है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह मंदिर 17वीं शताब्दी में बनाया गया था।

तवांग में स्थित इस मंदिर को तिब्बत के बौद्ध का एक पवित्र स्थल कहा जाता है। बताया जाता है कि प्राचीन काल में भारतीय शासक और तिब्बती शासक ने तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के लिए किसी सीमा का निर्धारण नहीं किया था। यहाँ तक कि 1912 तक तिब्बत और भारत के बीच कोई भी अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा नहीं खींची गई थी।

यह भी पढ़ें : भारत का चीन को जवाब : अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है भारत

हालांकि उस समय इन इलाकों पर न ही मुगलों का अधिकार था और न ही उस समय भारत पर शासन करने वाले अंग्रेजों का । यही वजह थी कि सीमा रेखा को लेकर भारत और तिब्बत के लोग असमंजस में थे। फिर भारत और तिब्बत के बीच सीमा रेखा के निर्धारण के लिए 1914 में शिमला में एक समझौता हुआ जिसमें चीन, तिब्बत और ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।

अरुणाचल प्रदेश को चीन अपना हिस्सा कहता है
अरुणाचल प्रदेश को चीन अपना हिस्सा कहता है

उस समय ब्रिटिश शासकों ने तवांग और दक्षिणी हिस्से को भारत का क्षेत्र बताया था। ब्रिटिश शासकों की बात को तिब्बत के प्रतिनिधियों ने तो स्वीकार कर लिया था। लेकिन चीन के प्रतिनिधियों ने इसे मानने से इंकार कर दिया था और बैठक से अलग हो गए थे।

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लेकिन बाद में इसे ही अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता मिल गई और तब से ही भारत और विश्व के नक्शे पर यही सीमा रेखा को दिखाया जाने लगा। तिब्बत अपने आपको भले ही स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर चुका है लेकिन चीन इस बात को स्वीकार नहीं करता और तिब्बत को स्वतंत्र राष्ट्र नहीं मानता है और इसीलिए वहां पर हुए फैसले को भी नहीं मानता और चाहता है कि तवांग पर अधिकार करके वह तिब्बती बौद्धों को अपने कब्जे में कर ले क्योंकि तवांग का क्षेत्र तिब्बती बौद्धों के लिए एक पवित्र जगह है।

मालूम हो कि 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ था तब चीन अरुणाचल प्रदेश में स्थित तवाँग पर कब्जा कर लिया था। लेकिन बाद में चीन पीछे हट गया और भारत उस पूरे इलाके पर अपना नियंत्रण कर लिया। दुनिया अरुणाचल प्रदेश के तवांग को अपना भारत का हिस्सा मानती है लेकिन चीन इस बात को स्वीकार नहीं करता है और इसीलिए इस क्षेत्र को अपना कहता रहता है।

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